हसरत-ए-अरमां / राजेन्द्र सिंह बिष्ट
चले थे बड़े गुमां के साथ दिल में हसरत-ए-अरमां लिए तलाश-ए-मजिल की निकल पड़े अन्जां राह पर…. निकल आये बहुत दूर कि दिखाई दी वीराने में धुंध रोशनी सी और धुधंली सी राह…. लेकिन जमाने...
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read more >>हाय रे ग़रीबी, तू भी कैसी साया है, छाँव में भी जलाए, धूप में भी सताया है। सपनों को गिरवी रख, क़र्ज़ में सांस लेती, एक घर की चाह में, उम्र सारी दे जाती है।...
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