हिंदी कोश

कविताएँ

मुझे कुछ मुफ़्त नहीं मिला / राजेन्द्र सिंह बिष्ट

मुझे कभी कुछ मुफ़्त नहीं मिला, न रोटी, न छत, न कोई सहारा मिला। बचपन भी ज़िम्मेदारियों में बीत गया, खुद से ही जीना सीखा, खुद ही संभाला। चौदह साल...

read more >>

लक्ष्य / अभिलाषा चौहान

लक्ष्य साधा है प्रिये तो अंत तक फिर साथ चलना हाल कैसा भी रहे पर प्रथ से अपने मत विचलना नेह के धागे सुकोमल,रेशमी भावों के मोती। ये समर्पण मांगते...

read more >>

आत्म मंथन / अभिलाषा चौहान

आत्म मंथन कर सको तो भूल भी तुमको दिखेगी धुंध जो छाई हटेगी कल्पना के पंख ऐसे,उड़ रहे जिनकी वजह से। सत्यता को भूल बैठे,भटकते अपनी जगह से। कर्म का...

read more >>

गीत अधूरा / उमाशंकर जोशी

हे प्रिय, मत छोड़ गीत अधूरा। हृदय तक जो आ पहुँचा उसे पीछे मत ठेल, हे प्रिय, होंठ तक जो आ पहुँचा उसे पीछे मत ठेल। मत खेल हे ढीठ...

read more >>

पिता के फूल / उमाशंकर जोशी

जिसके कंधे पर चिंताओं का बोझ बनकर घूमते रहे हम सारे आयु-मार्ग में, जग के विविध गली-कूचे में; चढ़ाव-उतराव में भटकते रहे हम बनकर जिसके सर की परेशानियाँ; ले आए...

read more >>

मनोहर छटा / आचार्य रामचंद्र शुक्ल

नीचे पर्वत थली रम्य रसिकन मन मोहत ऊपर निर्मल चन्द्र नवल आभायुत सोहत कबहुँ दृष्टि सों दुरत छिपत मेघन के आडें अन्धकार अधिकार तुरत निज आय पसारे नवल चंद्रिका छिटकि...

read more >>

विनती / आचार्य रामचंद्र शुक्ल

जय जय जग नायक करतार करत नाथ कर जोरि आज हम विनती बारम्बार प्रात समीर सरिस भारत महँ हिन्दी करै प्रसार जय जय जग नायक करतार खोलै परखि उनीदे नयनन...

read more >>

बुरी आदतों का चक्रव्यूह / शाहाना परवीन ‘शान’

बुरी आदतों का चक्रव्यूह वाक़ई बहुत खतरनाक होता है, धीरे-धीरे ये इंसान की सोच, समझ और संतुलन सब पर कब्ज़ा जमा लेता है। यदि समय रहते इन आदतों की लगाम...

read more >>

कुछ अनकहे से ज़ख्म (नज़्म) / शाहाना परवीन ‘शान’

ज़िंदगी में कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं, जिन्हें बताना नामुमकिन ही नहीं, बल्कि उन्हें छू लेने भर से साँसें भी कांपने लगती हैं। वो ज़ख़्म, जिन्हें हम देख नहीं पाते...

read more >>

आत्मकथ्य / जयशंकर प्रसाद

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी, मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी। इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास यह लो, करते ही रहते हैं अपना...

read more >>

परिचय / रामधारी सिंह दिनकर

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं समाना चाहता...

read more >>

छोटा मेरा खेत / उमाशंकर जोशी

छोटा मोरा खेत चौकोना कागज़ का एक पन्ना, कोई अंधड़ कहीं से आया क्षण का बीज बहाँ बोया गया । कल्पना के रसायनों को पी बीज गल गया नि:शेष; शब्द...

read more >>

संध्या सुन्दरी / सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

दिवसावसान का समय – मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुन्दरी, परी सी, धीरे, धीरे, धीरे, तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास, मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर, किंतु...

read more >>

तोड़ती पत्थर / सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

वह तोड़ती पत्थर; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर— वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बँधा यौवन, नत नयन...

read more >>

प्राप्ति / सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका । मुझे भर लिया तुमने गोद में, कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये;...

read more >>

हताश / सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

जीवन चिरकालिक क्रन्दन । मेरा अन्तर वज्रकठोर, देना जी भरसक झकझोर, मेरे दुख की गहन अन्ध- तम-निशि न कभी हो भोर, क्या होगी इतनी उज्वलता- इतना वन्दन अभिनन्दन ? हो...

read more >>