दास्ता-ए-नेगी
बदल जायेगा ये जमाना, राहे नेकी पर चलने से तेरे
गलतफहमी है तेरी, खुद को समझ और बदल।
गर है तू गरीब तो
अधिकार नही जीने का, कुछ करने का तुझे।
गर है तू ईमानदार तो
अधिकार नही रहने का तुझे समाज मे।
गर है तू खिलाफ रिश्वत के तो
काबिल नही तू नजरो मे नौकरशाहो की।
गर है तू देश के कानून के भरोसे तो
तेरा जो है वो भी छीन लेगा जालिम जमाना सारा।
गर छोड़ दे ईमाने धर्म तो
दुनिया होगी मुटठी मे तेरी
और होगा नाम तेरा शरीफो की गिनती में।
गर ढाल ले तू खुद को साथ समय के तो
तेरे साथ होगा जमाना सारा
और सफलता होगी कदमो मे तेरी।
गहरी नींद सो रहा, मीठे सपनो मे खोया
जमाने की कूटनीति से बेखबर, तभी तो है नाकाबिल ‘नेगी’
नौकरशाहो और समाज की नजरो में।
अब तो उठ जा ‘नेगी’ वरना सब कुछ छीन लेगा
ये जालिम जमाना तेरा।
(यह कविता मैंने वर्ष 2010 में उन दिनों लिखा था, जब मैं अपनी पत्रिका के रजिस्ट्रेशन के लिए सूचना विभाग में चक्कर काट रहा था, क्योंकि मेरे पास इतने रूपये नहीं थे कि मैं रिश्वत दे पाता, क्योंकि पत्रिका शुरू करना मेरा सपना था। उन दिनों मैं मात्र पन्द्रह सौ रूपये महीने में एक दुकान पर काम करता था। अपनी परिस्थितियों के कारण बिना रिश्वत के ही अपनी पत्रिका को पंजीकरण कराने का प्रयास कर रहा था। रिश्वत न दे पाने के कारण मेरे पंजीकरण को लगभग दो वर्षों तक लंबित रखा गया।)
