पिता के फूल
जिसके कंधे पर चिंताओं का बोझ बनकर
घूमते रहे हम सारे आयु-मार्ग में,
जग के विविध गली-कूचे में;
चढ़ाव-उतराव में भटकते रहे हम
बनकर जिसके सर की परेशानियाँ;
ले आए आज हम उस शरीर को उठाकर
अपने कंधे पर,
ले आए रे हम कंधे पर शरीर अपने जनक का।
पूर्वजदत्त प्राणधारा पुरातन
पली जिसकी अस्थियों में,
विस्मय जगाती वह बही हममें,
आए हम ऐसे जनक के अस्थिपुंज की भस्म से
चुन लेने को अग्निशेष फूल।
बुहारकर भरा गर्म राख को टोकरी में
और जाकर, पास में बहते सोते के जल में रखा, डुबोया,
शीतल किया, ज़रा हिलाया
और दूध-से दीखते प्रवाह से
चुने मानों तारक स्वर्गंगा के जल से!
चुन लिए तारक, फूल; जग का जो कुछ सुंदर, चुन लिया;
जो नहीं प्राप्य सरलता से, मिल गया आज वह सकल शिव;
शमित हुए मृत्युशोक, निरख कर अमर फहराती
पिता के फूलों में धवल कलगी विश्वक्रम की।
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