आत्म मंथन कर सको तो
भूल भी तुमको दिखेगी
धुंध जो छाई हटेगी

कल्पना के पंख ऐसे,उड़ रहे जिनकी वजह से।
सत्यता को भूल बैठे,भटकते अपनी जगह से।
कर्म का फल ही मिलेगा,सीख गीता ने सिखाई।
धर्म को जिसने भुलाया,पीर बस बदले में पाई।

लक्ष्य चिंतन कर सको तो
राह भी तुमको दिखेगी
धुंध जो छाई हटेगी

हो सफल हर बार ऐसा,भ्रम कभी मन में रखों क्यों
ठोकरें दे सीख तुमको,देख उनको डर रहे क्यों
सीप में मोती पले ज्यों,स्वप्न मन में पल रहें हैं
कंटकों के बीच देखो,पुष्प कैसे खिल रहें हैं।

साधना यदि कर सको तो
साध पूरी हो रहेगी
धुंध जो छाई हटेगी

हे पथिक!ये ध्यान कर लो,पंथ तो परिचित न होगा।
कूप खंदक खाई होंगे,प्रेम न तुमको मिलेगा।
छत भी सिर से छिनेगी,और दुख झोली भरेंगे।
ठान लो अब जीतना है,दिन तुम्हारे फिर फिरेंगे।

और संयम रख सको तो
जिंदगी फिर से हँसेंगी
धुंध जो छाई हटेगी।