क्यूँ बार-बार
क्यूँ बार-बार
हर बार
वो ही पुरानी बातें
दिल को
पागल कर देती हैं.
मन को दुखाती बेइंतहा
दिल को
बोझिल कर देती हैं.
समझ में आता नहीं
कुछ भी
पर मन तो
भारी हो जाता ही है.
रातों को जगाकर
उदासियों का सबब
बन जाता ही है.
एक बोझ सीने पर
पत्थर की माफिक
महसूस करा जाता है.
कहता नहीं कुछ भी पर
आँखो में पीड़ा
जगा जाता है.
कभी लगता है कि
छोड़ दो वो यादें
छोड़ दो वो
पुरानी बातें जो
दिल को आज भी
दर्द दे जाती हैं
आँखों में आँसू भरकर
ज़िंदगी को
वीरान कर जाती हैं
कोशिशें करके देख ली
पर कुछ हुआ नहीं हासिल
बिखरे से जज़्बात
नहीं रहते दिल के काबिल.
पास रहकर भी
एक दूरी सी लगती है,
महफिलों में भी तन्हाईयाँ
यूँ ही डसती रहती हैं.
कितनी भी
कर लो कोशिश
कुछ हम
कर पाते नहीं हैं
भावनाओं के
समंदर में
बिखरे से हम
बहते यूँ ही चले जाते हैं.
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