ज़िंदगी में कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं,
जिन्हें बताना नामुमकिन ही नहीं,
बल्कि उन्हें छू लेने भर से
साँसें भी कांपने लगती हैं।
वो ज़ख़्म, जिन्हें हम देख नहीं पाते
पर वे हर धड़कन में धड़कते रहते हैं
बेशक वे कुछ कहना चाहते हैं पर
खामोशियों में छुपे हुए से
बाहर आने से कतराते हैं..
कोई पूछे कि ये ज़ख़्म कैसे बनें?..
हम यही कहेगें कि
ये ज़ख्म छुरी या चाकू की नोंक
से नहीं बने
ना ही किसी के दबाव में आने से
बने हैं ये ज़ख़्म
बल्कि
ये तो बने हैं उन रिश्तों की खामोशी से,
उन उम्मीदों की मौत से,
और उन सपनों की राख से
जो अपनी ही हथेलियों पर
उगाए गए थे कभी….
कुछ ज़ख़्म
किसी को दिखाए नहीं जाते
क्योंकि दुनिया आँसू नहीं,
सबूत माँगती है।
और दर्द के सबूत
कभी मिलते कहाँ हैं?
वे बस महसूस होते हैं
सीने के भीतर,
जहाँ कभी कोई और पहुँच नहीं पाता।
कभी -कभी ये ज़ख़्म
अंधेरों और सन्नाटों में जाग उठते हैं,
ढूंढतें है कोई कंधा
जिस पर सिर रखकर
किसी को बता सकें और
कह सकें अपने हृदय की पीड़ा
सुनो…..
अगर कभी मिलें तो बताना
क्योंकि हम भी दिखाना चाहते हैं
अपने वे ज़ख़्म
जो अब तक छुपे हैं
ज़माने से और उन लोगों से
जिनकी वजह से ये हमें मिले हैं।