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डॉ. चंद्रभाल सुकुमार

डॉ. चंद्रभाल सुकुमार हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित ग़ज़लकार, कवि, साहित्यकार तथा सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं। वे वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से संबंधित हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य और न्यायिक सेवा—दोनों क्षेत्रों में समान रूप से उल्लेखनीय योगदान दिया है। साहित्य और न्याय—इन दो भिन्न धाराओं का उनका समन्वय उन्हें एक विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करता है।

शिक्षा एवं न्यायिक सेवा

डॉ. चंद्रभाल सुकुमार ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की तथा गोरखपुर विश्वविद्यालय से विधि स्नातक की उपाधि ली। उन्होंने लगभग 35 वर्षों तक न्यायिक सेवा दी और जनपद न्यायाधीश, इलाहाबाद के पद से वर्ष 2010 में सेवानिवृत्त हुए। इसके पश्चात वे राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, उत्तर प्रदेश (लखनऊ) में वरिष्ठ न्यायिक सदस्य रहे और 2016 में वहाँ से भी सेवानिवृत्त हुए।

साहित्यिक योगदान

डॉ. चंद्रभाल सुकुमार हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में एक सशक्त और स्थापित हस्ताक्षर माने जाते हैं। अब तक उनकी कई दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके प्रमुख ग़ज़ल संग्रहों में नदी के निकट, नीर गंधा, आप के पास से गुजरता हूँ, कंठ नीला हो गया है, शब्दों के रूद्राक्ष, ग़ज़ल रामायण, मैं नदी की धार हूँ और अप्सराओं के लिए संन्यास होते हैं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कविता, मुक्तक और काव्यानुवाद के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है।

साहित्यिक विशेषताएँ

उनकी रचनाओं की प्रमुख विशेषता भावनात्मक गहराई, दार्शनिक दृष्टि और शब्द-संयम है। उनकी ग़ज़लों में जीवन-अनुभव, न्याय-बोध, मानवीय संवेदना और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त समावेश मिलता है। उनकी भाषा सहज, गंभीर और प्रभावशाली है, जो पाठक को गहराई से प्रभावित करती है।

सम्मान व उपलब्धियाँ

डॉ. चंद्रभाल सुकुमार को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया है। उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से साहित्य रत्न, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ से विद्या-वाचस्पति सहित भारत गौरव, साहित्य शिरोमणि जैसे अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

डॉ. चंद्रभाल सुकुमार की प्रतिनिधि रचनाएं

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