पार्वती की शादी छुटपन में हो गई थी। वह गाँव की लड़की थी। पिता खेती-बारी का काम देखते थे। जात के ब्राह्मण थे, थोड़ी सी ज़मीन थी, स्वयं खेती का काम न कर सकने के कारण उन्होंने असामी रख लिए थे। जो कुछ उससे पैदा हो जाता उसी में किसी तरह गुजर कर लेते। कुटुम्ब कुछ छोटा न था। मां अभी जीती थी। एक विधवा भावज थी, जिसके दो बच्चे थे। उनके भरण-पोषण का भार भी पार्वती के पिता पर था। पार्वती से बड़े चार भाई बहनें थीं। भगवान की कृपा से किसी तरह दिन अच्छी तरह कट जाते थे। अधिकांश समय भजन-पूजन, भागवत – रामायण के पठन-पाठन में व्यतीत होता था। गाँव में मान भी अच्छा था। छोटे-बड़े सब में अपने नेक स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे। दान-दक्षिणा में जो धन मिलता था उसी से पार्वती के बड़े भाई इंट्रैन्स तक पढ़ सके थे। एक गाँव के ब्रांच में पोस्टमास्टर था, दूसरा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड में क्लर्क। दोनों अपनी बहुओं-बच्चों का पालन-पोषण करने लायक हो गए थे। पार्वती की बड़ी बहनों की शादी भी अच्छे ही घरों में हुई ! दोनों खुशहाल थीं। यही सन्तोष उसके नेक दरिद्र पिता की मानसिक संपत्ति थी।

पार्वती की शादी भी शहर ही में हो गई। उसके पिता की नेकी में प्रभाव था। अब वह निश्चिन्त हो और भी तल्लीनता से भगवान की आराधना में समय-यापन करते थे। पार्वती के पति शहर के डाकखाने में क्लर्क थे, पुराने अंग्रेजी मिडिल पास थे। दुबले पतले थे सही, पर स्वास्थ्य अच्छा था। पार्वती के भाग से ही उसे ऐसे स्वामी मिले थे। पार्वती के सिवा उनके और कोई विनोद न था, पोस्ट आफिस से सीधे घर आते और बालिका पार्वती के सहवास का सुख लूटते। और किसी ओर उनको आसक्ति या रुचि नहीं पाई जाती थी।

पार्वती का रंग साँवला था। लंबी नाक, लंबा मुख, काली- चिकनी स्नेह – करुणा- मिश्रित आँखें, हँसी में लाज, लालसा और कुछ कुछ विजय-दर्प था। नवयुवती होने के कारण सुन्दर न होने पर भी बुरी न लगती थी। शादी के बाद चौदह साल की होने पर पार्वती स्वामी के घर आई थी, गौना तभी हुआ था। उसके स्वामी के लिए उसका स्त्रीत्व काफ़ी था, सुन्दरता की उन्हें ऐसी परवाह न थी। जिस प्रकार गाँव के साधारण संसार में, पिता के सात्विक गृह में पली हुई पार्वती के मन में पति के घर के लिए कोई विशेष कल्पना न थी, केवल ब्याह का अनिर्वचनीय भाव और पति मिलने का लालसा-हीन, अज्ञात, गुप्त सुख ही सब कुछ था, उसी तरह पार्वती के पति के लिए भी स्त्री की सुन्दरता और गुणों का अधिक मूल्य नहीं था, केवल किसी स्त्री के अपनी पत्नी होने के भाव में ही सबसे अधिक मोहिनी थी। संभव है यह नई जवानी के कारण हो या साधारण वातावरण में पलने के कारण। दूसरी अपनी बन गई है, कैसा मधुर रहस्य है ! दूर एक दम समीप आ गया, नहीं दूर-पास का भेद भी नहीं रह गया, कल्पना ने सत्य का आसन ग्रहण कर लिया, अपने ही साथ एक ही आसन ! उसे छिपाकर, कल्पना ही रखकर, उसकी मनोहरता को चारों ओर से घेरकर उसकी रक्षा करनी चाहिए | पत्नी के प्रति उनके अस्पष्ट भावों का ऐसा ही कुछ अर्थ था। वह स्वभाव से थे भी स्त्री-प्रिय। उस स्त्री के बड़े भाग्य हैं जिसे स्त्री-प्रिय स्वामी मिलता है, पुरुष तो बाहर ही के संसार में खोया रहता। गाँव की पार्वती के और भी बड़े भाग्य थे जो वह शहर का घर और स्त्रैणपति पा गई ! बाहर की सारी संपत्ति जैसे उसे अपनी मुट्ठी के भीतर मिल गई। पति का समस्त लाड़-प्यार और ध्यान अपनी ओर खिंचा पाकर पार्वती आत्म-विजय, दर्प और आनन्द से पूर्ण होकर जीवन व्यतीत करने लगी। गाँव की लड़की होने के कारण वह घर का सारा काम-काज बात की बात में पूरा कर डालती, इसमें उसे जरा भी आलस न लगता था। वह हृष्ट-पुष्ट थी। अपने ही हाथ से खाना पकाती रोटी बनाकर बड़े चाव से पति को खिलाती। कभी-कभी, पेट में अधिक न समा सकने के कारण, विवश हो पत्नी का आग्रह टाल देने पर दंपति में मधुर – कलह का भी उदय हो जाता, पर वह दोनों की आँखें मिलते ही डूब भी जाता था। पार्वती के प्रेम में समानता भाव से अधिक आदर ही का भाव था। इसीलिए, जिस प्रकार प्रेमी युगल परस्पर विश्वास एवं प्रेम का उपभोग करने, प्रायः लड़ने, एक दूसरे को उत्तेजित करने एवं खिझाने में किसी प्रकार का संकोच या कसर नहीं रखते, उस प्रकार का दृश्य पार्वती कभी अपने सरल दांपत्य- नाटक में न उपस्थित होने देती। पति के कटाक्षों, तानों, उत्तेजनाओं को वह हँसकर, सिर मटकाकर, सहकर निर्मल कर देती।

पार्वती को कपड़ों का अधिक शौक़ न था। बनाव-शृङ्गार की और कभी उसका ध्यान ही न जाता। वह हमेशा सीधी-सादी लिबास में रहती। दूसरी स्त्रियों के रूप से उसने कभी अपने रूप की तुलना भी नहीं की। सुन्दरता, साज और शृङ्गार के परे उसके स्वामी ने अपने समस्त हृदय से उसे जिस रूप में अपना लिया था, स्वीकार कर लिया था, उसी से उसकी आत्मतृप्ति हो जाती थी। पति के अधिक प्रेम के कारण उसकी शृङ्गार और भोग की लालसाएँ सीमित हो गई। गृहस्थी के खर्च से जो कुछ बचता उससे पार्वती अपने लिए गहने बनवा लेती थी, उन्हें वह संपत्ति समझती थी, जिससे लक्ष्मी स्थिर रहती थी। वे गहने पति को रिझाने के काम में नहीं आते थे, हाँ, कभी तिथि-त्योहार के रोज या पास-पड़ोस में व्याह-काज के समय पार्वती गहनों के चलन का खूब सदुपयोग करती थी। उसके स्वामी उसे अधिक देर तक बाहर नहीं रहने देते थे। पार्वती का भी कहीं जी नहीं लगता था। भीतर ही भीतर उसे जान पड़ता था कि बाहर जिन सब वस्तुओं से स्त्री का मूल्य आँका जाता है, वैसा उसमें कुछ नहीं है। केवल उसके स्वामी के ही ऐसी दिव्य-दृष्टि है कि जिसने आत्मा के भीतर छिपा उसका गौरव पहचान लिया, और उस पर निछावर हो गए। इसीलिए पार्वती भी सखी-सहेलियों से कटकर स्वामी के ही पास जीवन का अनुभव करती, उसे पति को घेरे रहने की आदत पड़ गई थी।

इस दंपति के बीच कुछ अधिक बातें या रसालाप नहीं होता था। दोनों केवल एक दूसरे की उपस्थिति के प्यासे थे। दोनों अपने को एक दूसरे की आँखों से और सम्बन्ध में देखकर केन्द्रित एवं आत्मस्थ हो सुख पाते थे। दोनों के बीच दूरी रहने पर भी जैसे शरीर शरीर छुए रहता था। वह भले ही किसी उच्च श्रेणी का असीम बन जाने का आनंद या भाववाचक उल्लास न हो, पर वह सीमित बन जाने का सुख था, और पूर्ण सुख था, मांस का सुख था। एक का मन दूसरे का शरीर रूप धारण कर लेता था, दोनों के मन एक दूसरे की गन्ध से भरे रहते थे, इसीलिए दूर रहने पर भी दोनों के शरीर मिले रहते थे।

उनकी आपस में बिलकुल सामान्य बातें हुआ करती थीं। न उनमें कला रहती, न संस्कृति, और न भाव व्यञ्जना | सत्य को दोनों अपने भीतर – गहरे भीतर- छिपाए रहते, और उस असलियत के परस्पर छिपाव का दोनों उपभोग करते। वे पति- पत्नी हैं, सब तरह से एक हैं, एक को दूसरे पर अधिकार से, पूर्ण स्वतन्त्रता और…प्रेम ! उह, इन बातों को कहने की भी ज़रूरत है? इन बातों की याद भी क्यों आए? जीवन का सार अन्तस्तल में छिपा रहे | क्या हृदय में धड़कन नहीं है? कौन हर समय उस पर मन देता है, वह तो जीवन का रहस्य ही है ! गुप्त, अति गुह्य ! उस पर विस्मृति के जितने परदे पड़ सकें उतना ही सुख है, आनन्द है, स्वतन्त्रता है। याद आने से जैसे मन दबने लगता है, हृदय पर बोझ आ जाता है, आशंका, भय, ताप-न जाने क्यों? नहीं, नहीं, वे एक नहीं, दो हैं, अपरिचित हैं, भिन्न हैं, उन्हें आपस में कुछ बोलना चाहिए, स्वाँग करना चाहिए, सहानुभूति, आदर रखना चाहिए – कुछ व्यापार तो हो। एक होना तो चुप्पी है, – वे दो हैं।

ओह, उनकी कैसे बातें होती थीं? उनमें केवल वाणी होती, शब्द होते, मन की गर्मी और ठण्डक होती। प्रेम-प्रकाशन नहीं, भाव नहीं, अलंकार नहीं – और अर्थ भी क्या होता? उनकी बातें वस्तुएँ होतीं, यही आटा-दाल, घर- बरतन, तरकारी इत्यादि। उनकी बातें कार्य होतीं – आँखों का मिलना, झपना, हाथों का उठना – गिरना, परस्पर सेवा इत्यादि। फिर भी न जाने कैसे इन्हीं जड़ चेष्टाओं द्वारा उनके भीतर रस छलकता रहता था, गुप्त रूप से ! क्या लिखूँ? कुछ भी तो प्रकट नहीं है, – सब कुछ एक दम छिपा हुआ, साधारण, प्रचलित, प्रतिदिन का। कला के लिए उनकी कहानी में स्थान भी है? कला को छिपाना ही कला है या नहीं, पर अपने को छिपाना ही उनका जीवन था। एक क्लर्क को गृहस्थी का, गाँव की अशिक्षित साँवली पत्नी और शहर के नाममात्र को शिक्षित निर्बल पति के जीवन का जो साधारण, सुन्दरता हीन गद्य था उसे उन्होंने इतना अधिक अपना लिया था या भुला दिया था कि वह उनका सर्वस्व बनकर, कुछ न बनकर, पद्य हो गया था, उनकी लय में मिल गया था। ओह कितना सामान्य, सस्ता, प्रति दिन का, सब का, कामकाज मात्र का उनका वह कवित्व होता था ! वे दोनों मांस के टुकड़े या पिण्ड थे। आत्मा और मन भी मांस बन कर मूक, जड़, विचार- बुद्धि-शून्य बन गए थे, या उनसे ऊपर उठ गए थे? वे शायद चेतना भी खो बैठे थे – हम हैं इसका ज्ञान भी। केवल दो मांस-लोथ परस्पर घुल-मिलकर अपने को भूल गए थे, घुलने-मिलने का संस्कार बन गए थे। एक-दूसरे को अधिक पहचानते थे, स्वयं खो गए थे।

यह सब तो मैंने ज्यों का त्यों लिख दिया, पर इस बीच समय और सृष्टि चक्र भी तो अपना काम करते रहे। मनुष्य – प्रकृति, प्रवृत्तिएँ, शारीरिक संपर्क, व्याह की मुक्ति सभी ने मिलकर, चिर- परिचितों की तरह आकर, पार्वती के संसार को बदलने में, बड़ा बनाने में मदद दी। इतिहास, शास्त्र और स्वभाव की दुहाई देनी व्यर्थ है। जन-संख्या का प्रश्न, सन्तान-निग्रह, कृत्रिम – अकृत्रिम उपाय कल की बातें हैं। यह सत्य से भी अधिक दम्पति के लिए मानी और जानी हुई बात थी, यही कि दोनों अब अधेड़ हो गए, पार्वती कई लड़के-लड़कियों की मां बन गई। होता आया है, हो रहा है और होगा। भगवान न कि करे कुछ और हो ! हाँ, तो वित्तानुसार कई छोटे-बड़े उत्सव आए, गृहस्थी में रोना आया, हँसी आई ; कलरव- किलोल, पुचकार-फटकार, सुख-दुःख सब में अभ्युदय के ही चिह्न प्रकट हुए। नए रूप, रंग, नई इच्छा, आशाएँ। नए-नए कलह और नई चिन्ताएँ ! बहुत बड़ा परिवर्तन उपस्थित हो गया। प्रारम्भ की छोटी सी गृहस्थी नई हुई कि पुरानी, आगे बढ़ी कि पिछड़ी, ये बातें किस काम की हैं? जैसा होता है, हुआ। दंपति की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक दशा धीरे-धीरे अच्छे के लिए बदली कि बुरे के लिए, दोनों का रूप-रंग निखर कर कहाँ चला गया, या क्या हुआ; कितने रोग आए, शोक आए, हर्ष आए अभ्युदय आए, शिशिर आए, बसन्त आए ! किस पहलू पर जोर दिया जाय, किस दृष्टिकोण से देखा जाय? क्या कहा जाय, क्या छिपाया जाय? यह तो इस दंपति के गृहस्थ की कहानी नहीं, यह कथा तो एक दूसरी ही कथा है। इसके लिए इतिहास पढ़िए, दर्शन पढ़िए, ज्ञान-विज्ञान देखिए। हाँ, तो समय-समय पर वह सब कुछ होता रहा।

पर पार्वती के पुत्रशोक की बात लिखनी ही पड़ेगी। बीस-बाइस साल के लड़के का मस्तिष्क खराब हो गया और अन्त में यक्ष्मा का शिकार बन परलोकवासी बन गया | पार्वती ने उसके लिए जितने आँसू बहाए उतनी रोगी की सेवा नहीं की। पागल लड़का मनुष्य तो समझा नहीं जाता। उसकी ओर से ध्यान वैसे ही खिंच जाता है। वह तो देवी प्रकोप की बात है; दुःसाध्य, उसमें किसी का क्या वश? और यक्ष्मा का रोग भी तो काल ही का निमंत्रण है। रोगी तो पहले ही मरा समझ लिया जाता है। विदेशी दवाओं के लिए वैद्य एकदम नाहीं भरते हैं। और साधारण स्थिति के डाकखाने के बाबू के लड़के के लिए बहुमूल्य रसादि दवाएँ भी कहाँ तक खर्च की जा सकती हैं। सैनेटोरियम और स्वच्छ जलवायु के स्वप्न देखना भी ऐसे लोगों के लिए संगत नहीं। तिस पर भी लड़का पागल ठहरा ! भई, सच्ची बात है, मृत्यु की चापलूसी करने से क्या फायदा? सभी लोग भीतर ही भीतर ठीक बात अच्छी तरह समझते हैं। क्या किया जाय सब तरह से लाचारी ही लाचारी थी। आँसू बहाने में मातृ-हृदय ने किसी प्रकार की कमी नहीं रक्खी। धीरे-धीरे समय ने कब बिचारी के हृदय का घाव किस तरह भर दिया इसे कोई नहीं जानता। बाहर से तो ये गूंगे दंपति दुरुस्त ही दीखते हैं। भीतर अब भी छिपी हुई कसक हो कौन जाने? शादी के बाद प्रसूत-बाधा से एक लड़की भी पार्वती की जाती रही। जन्म-मृत्यु किसके हाथ में हैं? अब उसके लिए दो लड़के और एक लड़की रह गए हैं। बड़े लड़के ने स्कूल लीविंग के बाद पिता के पद का अनुसरण कर लिया। पिता को अब पैंशन हो गई है। लड़के की शादी अच्छे घर हुई, पर स्त्री रुग्ण ही रहती है। सुनता हूँ, दो तीन बच्चों की मां भी बन गई है। कोई कहते हैं कि गरीबों के लिए स्त्री-प्रसंग ही एकमात्र मनोरञ्जन रह जाता है; संभव है। पर पुत्र ने भी स्त्री के बारे में सोलहो आने पिता का स्वभाव पाया है। पार्वती दूसरी कन्या का विवाह भी संपन्न कर चुकी है। छोटा पुत्र जो अभी विद्यार्थी ही है मां के पास रहता है।

पार्वती के स्वामी का बुढ़ापा मैं ठीक-ठीक न लिख सकूँगा। कला को उससे शायद ही सहानुभूति हो सके, उसकी आलोचना कर सकता हूँ। उनके मन में सन्तान के लिए रत्ती भर अनुराग देखने को नहीं मिलता। पत्नी के बाद उनके हृदय में धन-संग्रह करने की इच्छा ने घर कर लिया है, बुढ़ापे के साथ-साथ यह रोग और भी बढ़ रहा है। वह अँगूठे को तर्जनी से रगड़ते हुए सांकेतिक भाषा में सब पर यही प्रकट करते हैं कि रुपयों के बिना कुछ नहीं होता, रुपयों का बड़ा अभाव है। दूसरों के बारे में भी वह केवल उनकी माली हालत जानना पसंद करते हैं। अपने छोटे से वेतन में उन्होंने थोड़ा बहुत अवश्य संचय कर लिया है।

दूसरों के सामने पार्वती के पति अपने को सदैव रुग्ण, निःशक्त, निकम्मा एवं दयनीय दिखलाया करते हैं। जैसे वह सीधे-सादे, कुछ न समझने वाले, अबोध एवं इस जटिल संसार में जीवन-यापन करने के लिए एकदम अयोग्य और अक्षय हों। इस प्रकार वह दूसरों की सहानुभूति भी अर्जन करने का शौक रखते हैं।

वे सदैव स्वस्थ अवस्था में भी रोगी से बने रहते हैं। उठने- बैठने में कराहना, आँखो में याचना का भाव भर लेना, मुख सिकोड़कर उसे कुर्रियों की जाली में छिपा लेना, यह उनका बुढ़ापे का अभिनय है। इस प्रकार का दिखावा और स्वांग पार्वती को भी अब बहुत देखना और सहना पड़ता है। इसी के बहाने वह उससे अब छोटी से छोटी सेवा और काम करवा लेते हैं। संभव है युवावस्था के उनके गूँगे प्रेम की ऐसी ही अपाहिज परिणति हुई हो।

पार्वती ने उनके प्रेम और धन संचय के भाव को अपना लिया है। पति के प्रेम पर वह मुग्ध है, उनकी ज्यादतियों और दुर्बलताओं के प्रति अनजान पर संभव है यह उसका व्यवहार का चित्र हो, भीतर ही भीतर वह उन पर खीझती, ऊबती हो। किन्तु अपने पति के प्रेम-प्रदर्शन से उसे कभी तृप्ति नहीं होती। जब कभी उसके पति उसका नाम लेकर, या बेटे-बेटी को संबोधनकर उसे पुकार लगाते, अथवा औरतों के गिरोह की परवाह न कर उसके पास जाकर खड़े हो जाते, अथवा घर का काज करते समय उसका पल्ला पकड़े रहते — जैसा कि बुढ़ापे में, पैंशन पाने के बाद, उनका अभ्यास हो गया है, तब पार्वती लाज, संकोच, खीझ, ऊब का अभिनय करती हुई भी भीतर ही भीतर उनकी उस अनुरक्ति का उपयोग करती देखी गई है। वह उनसे उलाहने के स्वर में कहती- मेरे साथ साथ क्या फिर रहे हो, कोई काग़ज़ या अखबार हाथ में क्यों नहीं लेते। या अपने लड़के से कहती- गिरीन्द्र, बेटा, जरा इनसे कह तो दे सही कि काग़ज़ बाँचें, जरा घूमें फिरें, धूप का मुँह देखें, कह तो दे बेटा !

अभी हाल में पार्वती के स्वामी बीमार पड़ गए थे। रोग ने अचानक भयंकर रूप पकड़ लिया। पार्वती ने जिस लगन, साहस, और दिन-रात के अथक परिश्रम से उनकी सेवा-सुश्रूषा की वह अवर्णनीय है। काल से लड़कर जैसे उसने अपने स्वामी को फिर से लौटा लिया। पड़ोस के पढ़े लिखों का कहना है कि अपने समाज में स्त्री की परवशता ही पार्वती के इस भगीरथ प्रयत्न का कारण है। पुत्र के लिए यह सेवा – परायणता की प्रवृत्ति उसकी कहाँ सो रही थी? अतः उसे अधिक श्रेय नहीं देते। पर पढ़े-लिखे संदिग्ध जो रहते हैं? पुराने लोग तो इसका कारण पार्वती की अनन्य पतिभक्ति ही बतलाते हैं, और इसके लिए उस सावित्री की प्रशंसा करते हैं। पार्वती को स्वयं उसका कारण ज्ञात नहीं। आश्चर्य उसे भी होता है कि पति को मृत्यु के मुख में देखकर उसके दीर्घ जीवन के परिश्रम से थके, गले बूढ़े अंगों में वैसी प्रबल शक्ति कहाँ से आ गई, नींद-भूख भी कहाँ खो गई ! जो कुछ भी हो, पति को जीवनदान मिल गया, भगवान दया- निधान हैं।

बीमारी के बाद, कुछ बुढ़ापे के कारण भी, पार्वती के स्वामी की स्मृति बहुत क्षीण हो गई है। कभी-कभी भ्रान्त भी हो जाते हैं | स्वप्न को जाग्रत अवस्था की घटना समझने लगते हैं। आँखों में शाक्तिहीन चमक आ गई है। मस्तिष्क की नाड़ियों पर अधिकार खो रहे हैं। अब वे पार्वती के बिना क्षण भर नहीं रह सकते। वही मां है, वही मंत्री, वही सखी। पार्वती के स्वामी खुली हुई ग्राम्य हँसी हँसते हैं, हँसने में हाथ पर हाथ भी मारते हैं। उस हँसी ने अब भी उनका साथ नहीं छोड़ा है। उनमें एक प्रकार की रसिकता की मात्रा भी है। पार्वती को अब प्रायः उसका स्वाद मिला करता है। अब भी पार्वती का जीवन ही दंपति का जीवन है। पेंशन के बाद छोटी सी आर्थिक दशा में और भी कमी आ जाने के कारण बूढ़ी पार्वती पर घर के प्रबन्ध का भार और बढ़ गया है। वह स्वयं पानी खींचती, बरतन माँजती है। उसके सिर पर बात का गोला निकल आया है। कभी मैंने। उसे खिन्न, विरक्त, ऊबा-खीझा नहीं पाया। कष्टों के प्रति यह पुरुषार्थवादी विरक्ति उसकी श्लाघनीय है। अब भी स्वामी का मुसकुराते मुख से स्वागत करती है। वह आधार है, स्वामी चित्र; वह रूप, रेखा, रंग है, स्वामी मूर्ति। वह गृहस्थ की अस्थि का ढाँचा है, स्वामी, माँस पिण्ड, वह निद्रा है स्वामी स्वप्न, वह चेतना स्वामी अनुभूति।

उस रोज स्वामी के पास, सुबह के समय, पानी का लोटा रखते हुए पार्वती ने मधुर उपदेश के साथ कहा-

“लीजिए, हाथ-मुँह धो लीजिए। एक लोटा बदन में भी डाल लीजिए : ब्रह्मण का चोला ठहरा। कहा है, धन की शुद्धि दान से, देह की शुद्धि स्नान से।”

स्वामी ने जैसे सोते से जगकर पूछा–“क्या कहा? धन की शुद्धि स्नान?”

पार्वती ने वात्सल्य भाव से दुहराकर समझाते हुए कहा- “हाँ, हाँ, धन की शुद्धि स्नान से।” उसके स्वामी ने फिर से उस वाक्य को दुहराया, और साश्चार्य मुग्ध-दृष्टि से, सिर हिलाते हुए, बार-बार उसकी नीतिमत्ता और बुद्धि की प्रशंसा की – “वाह, तुम बहुत ही होशियार हो।”

पार्वती ने आत्म-प्रशंसा से बचने के लिए मधुर विरक्ति से उत्तर दिया, -“ऊँह, मुझसे कैसी-कैसी होशियार औरतें हैं।”

स्वामी ने आश्चर्य से आँखें फाड़कर कहा – “अच्छा? मैंने तो शहर और गाँव में तुम्हारी तरह होशियार किसी को नहीं देखा। ” पार्वती ने प्रसन्न होकर विरोध किया – “तुमने और किसी की ओर देखा भी।”

संभव है पार्वती के स्वामी ने केवल रसिकता वश वह नाटकीय कथोपकथन गढ़ा हो जिससे पार्वती को आत्म-तुष्टि मिली।